क़ुरान ईश्वर का शब्द क्यों नहीं है

 

कॉपीराइट 2010 ऐरन एम. गरनर

सर्वाधिकार सुरक्षित। इस प्रकाशन के किसी भी हिस्से को पुनःप्रस्तुत, एक पुनःप्राप्ति (रिट्रीवल) प्रणाली में संग्रहित, या किसी भी रूप में किसी भी इलेक्ट्रॉनिक, यांत्रिक, फोटोकॉपी, रिकार्डिंग, या अन्य तरीके से, प्रकाशक की पूर्व अनुमति के बिना संचारित नहीं किया जा सकता, जबतक यूएसए के कॉपीराइट कानून में इसका अधिकार प्रदान नहीं किया गया हो।  

 

 

 

 

नमस्कार,

 

मेरा नाम ऐरन है और मैं एक ईसाई पादरी हूँ। कई वर्षों के दौरान मैंने दुनिया के चारों कोनों के लाखों मुसलमानों से बात की है, जिनमें यह देश शामिल हैं: अफगानिस्तान, मिस्र, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, कुवैत, लीबिया, ओमान, पाकिस्तान, क़तर, सऊदी अरब, सूडान, सीरिया, संयुक्त अरब अमीरात, संयुक्त राज्य अमेरिका, यमन और ज़िम्बाब्वे।

 

मैंने काफ़ी पत्राचार एकत्र किया है और यह पुस्तक लिखने का फैसला किया है यह बताने के लिए कि क्यों यीशु मसीह हैं, जीवित ईश्वर के बेटे। निम्नलिखित, पुस्तक में से एक नमूना है जिनमें मुसलमानों के द्वारा भेजे गए वास्तविक ईमेल और मेरे द्वारा दी गई प्रतिक्रियाएं शामिल हैँ।

 

यदि आप, आपके पड़ोसी, साथी, या मित्र ईसाई धर्म और इस्लाम के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं, तो प्रारंभ करने के लिए यह एक अच्छी जगह है। यदि, इस पुस्तक को पढ़ने के बाद भी आप ईसाई धर्म के सत्य के बारे में यकीन नहीं करते, तो पुस्तक के अंत में मैं एक ईमेल दूँगा ताकि आप सीधे मुझसे बात कर सकें।

 

मैं पुस्तक के लिए एक छोटी-सी कीमत माँगता हूँ, उनमें अंतर करने के लिए जो गंभीर हैं और जो अपनी मान्यताओं के बारे में सोचने को तैयार हैं बनाम उनके जो नहीं हैं। ईश्वर तुम्हें रास्ता दिखाए और तुम्हें उसको जानने के लिए और उसे दूसरों पर ज़ाहिर करने के लिए एक बढ़ती भूख और प्यास दे।

 

नीतिवचन 4:7-9

"तू बुद्धि प्राप्त कर, चाहे सब कुछ देकर भी तू इसे प्राप्त कर। तू समझबूझ प्राप्त कर। तू उसे महत्व दे, वह तुझे उँचा उठाएगी; तू उसे गले लगा ले, वह तेरा मान बढ़ाएगी। वह तेरे सिर पर शोभा की माला धरेगी आर वह तुझे वैभव का एक मुकुट देगी।"

 

 

साभार,

ऐरन

 

 

???? ???? ?????? ????? ?? ???? ????? ???? ??

 

 

क्रूस पर यीशु की मृत्यु और क़ुरान

 

1 कुरिन्थियाँ 15:1-4

हे भाइयों, अब मैं तुम्हें उस सुसमाचार की याद दिलाना चाहता हूँ जिसे मैंने तुम्हें सुनाया था और तुमने भी जिसे ग्रहण किया था और जिसमें तुम निरंतर स्थिर बने हुए हो। और जिसके द्वारा तुम्हारा उद्धार भी हो रहा है बशर्तें तुम उन शब्दों को जिनको मैंने तुमको आदेश दिया था, अपने में दृढ़ता से थामे रखो। नहीं तो तुम्हारा विश्वास धारण करना ही बेकार गया। जो सर्वप्रथम बात मुझे प्राप्त हुई थी, उसे मैंने तुम तक पहुँचा दिया कि शास्त्रों के अनुसार मसीह हमारे पापों के लिए मरा और उसे दफना दिया गया। और शास्त्र कहता है कि फिर तीसरे दिन उसे जिला कर उठा दिया गया।

 

पृष्ठभूमि

 

सैकड़ों मुसलमान यीशु की क्रूस पर हुई मृत्यु से इनकार करते हैं। यह उस महत्वपूर्ण टिप्पणी को पेश करती है कि ईसाई धर्म, इतिहास में ईश्वर के काम में निहित है। बल्कि, ईसाई धर्म के केंद्रीय दावे पहले भी और कुछ अभी भी ऐतिहासिक जांच के लिए खुले हैं। ईसाईयों के विश्वास और ईश्वर ने दुनिया में जो किया है उसमें तालमेल है।

 

 

ईसाई धर्म के विद्वान, जे. ग्रेसम मेचेन, ने लिखा है,

                        "आदिम चर्च केवल उससे संबंधित नहीं था जो यीशु ने कहा था, बल्कि मुख्य रूप से, उससे भी संबंधित था जो यीशु ने किया था। दुनिया को एक घटना की उद्घोषणा के माध्यम से मुक्त करना था। और घटना के साथ घटना का अर्थ भी था; और घटना की स्थापना के साथ घटना का अर्थ सिद्धांत था। यह दोनों तत्व ईसाई संदेश में हमेशा सम्मिलित रहे हैं। तथ्यों का वर्णन इतिहास है, तथ्यों के अर्थ के साथ तथ्यों का वर्णन सिद्धांत है। " पॉनटियस पीलातुस के तहत क्रूस पर चढ़ाया गया, मारा गया और दफनाया गया"-- यह इतिहास है। "वह मुझे प्यार करता था और मेरे लिए उसने स्वयं को दिया"--यह सिद्धांत है। इस तरह था आदिम चर्च का ईसाई धर्म।"

 

ईसाई धर्म के धर्मशास्त्री, जॉर्ज एल्टन लैड, हमें याद दिलाते हैं कि,

"ईसाई धर्म की अद्वितीयता और लोकापवाद ऐतिहासिक घटनाओं के माध्यम से रहस्योद्घाटन की मध्यस्थता पर आश्रित है। हिब्रू-ईसाई विश्वास अपने पर्यावरण के धर्मों से अलग इसलिए खड़ा है क्योंकि यह एक ऐतिहासिक विश्वास है, जबकि वे धर्म पौराणिक कथाओं में या प्रकृति के चक्र में निहित थे। इस्राईल के इश्वर इतिहास के इश्वर थे, या जैसे जर्मन धर्मशास्त्रियों ने बहुत स्पष्ट रूप से कहा, गेशिशटगॉट। हिब्रू-ईसाई विश्वास बड़े-बड़े तात्त्विक अनुमानों या गहरी रहस्यमय अनुभवों से नहीं पैदा हुआ है। यह इसराइल के पुराने एवं  नए ऐतिहासिक अनुभवों से पैदा हुआ है, जिसमें इश्वर ने स्वयं को ज्ञात करवाया। यह तथ्य, ईसाई धर्म को एक विशिष्ट विषय और निष्पक्षता प्रदान करता है जो इसे दूसरों से अलग करता है...बाइबिल मुख्य रूप से महान विचारकों की एक श्रृंखला के धार्मिक विचारों का संग्रह नहीं है। पहली बात यह है कि बाइबिल धार्मिक अवधारणाओं की एक प्रणाली नहीं है और तात्त्विक अनुमानों की तो बिल्कुल भी नहीं... इश्वर के ऐतिहासिक कार्यों का गायन ईसाई उद्घोषणा का पदार्थ है।"

 

 

इश्वर स्वयं को केवल अपने शब्दों में ही नहीं, बल्कि अपने कार्यों में भी ज्ञात कराता है; इश्वर इतिहास में काम करता है। ईसाई इश्वर के बारे में जो विश्वास करते हैं और इश्वर ने वास्तविकता में इतिहास में जो किया है, उसके बीच एक संबंध है। और इतिहास यीशु मसीह के चारों ओर घूमता है। इतिहास में इश्वर के काम को अस्वीकार करना इश्वर को अस्वीकार करना है [1] इतिहास को अस्वीकार करना तर्कसंगत नहीं है और इतिहास में इश्वर के काम को अस्वीकार करना नास्तिकता है।

 

क़ुरान इतिहास के बारे में कुछ ऐसा दावा करता है जो प्रथम शताब्दी ई. में देखे और दर्ज किए गए के विपरीत है, "न तो उन्होंने उसे क़त्ल किया, न तो उसे क्रूस पर चढ़ाया, परन्तु उन्हें ऐसा दिखाया गया था" (अन-निसा 4:157)। क्रूस पर यीशु की मृत्यु से इस्लाम का इनकार इतिहास को एक कट्टरपंथी रूप से फिर से परिभाषित करना है। गोलगोथा में सदियों पहले क्या हुआ था उसके बारे में जानने में अवलोकन, साक्षी, गवाही, और मानव विश्लेषण की बहुत छोटी या कोई भी भूमिका नहीं है। केवल एक चीज़ ही महत्व रखती है कि मुहम्मद का यह दावा है कि एक फरिश्ते ने उन्हें अतीत में हुई एक घटना के बारे में कुछ ऐसा बताया जो देखे गए और दर्ज किए गए से बिल्कुल विपरीत है। यह सब इसके बावजूद है कि मुहम्मद घटना के सैकड़ों वर्ष बाद आए, सैकड़ों मील दूर रहते थे, और उन्होंने इस बात का कोई सबूत नहीं दिया। इतिहास को अस्वीकार करने के दुःखद परिणाम होते हैं जैसे हमने अपने समय में हालकॉस्ट से अस्वीकार करने वालों के बारे में देखा है।

 

 

मुसलमानों के ईमेल

 

 

Ø हमारा विश्वास है कि यीशु एक महान ईश्वरदूत थे और उनकी माँ एक पवित्र औरत थी। हम ट्रिनिटी, क्रूस पर चढ़ाना, या पहले पाप या मुक्तिदाता में विश्वास नहीं करते हैं। इन चार बातों को छोड़ना और मसीह की शिक्षाओं का पालन करना ईसाईयों के लिए एक अच्छा मनुष्य बनने के लिए पर्याप्त है। चीज़ों को क्यों दार्शनिक रूप से प्रस्तुत करना और उलझाना??? !!!

 

 

Ø मैं इस प्रश्न का उत्तर देना चाहता हूँ "क्या यीशु की मृत्यु क्रूस पर हुई?" मैं किसी भी धर्म को नाराज़ करने के लिए नहीं कह रहा हूँ बल्कि सत्य कह रहा हूँ। क़ुरान के अनुसार, यीशु की मृत्यु क्रूस पर नहीं हुई, बल्कि ईश्वर ने उन्हें अपने पास उठा लिया (4:157-158), जबकि बाइबिल यह कहता है कि यीशु को क्रूस पर चढ़ाया गया (मत्ती 16:21)। परन्तु यदि आप (मत्ती 27:30-37),(मरकूस 15;19-25)(लूका 23:26-27) पढ़ें, तो सायरीनी के साइमन को क्रूस पर चढ़ाया गया था।

 

 

 

मेरा ईसाई उत्तर

 

 

 

कृपया क्रूस पर यीशु की मृत्यु के पीछे ऐतिहासिक घटना तथ्यों पर ग़ौर करें:

ओल्ड टैस्टमेंट के ईश्वरदूतों ने यीशु की मृत्यु और दफ़नाने के बारे में गवाही दी थी। उदाहरण के लिए, यशायाह ने यीशु से लगभग 700 साल पहले यह लिखा था,

यशायाह 53:7-9

उसे सताया गया और दण्डित किया गया। किन्तु उसने उसके विरोध में अपना मुँह नहीं खोला। वह वध के लिए ले जायी जाने वाली भेड़ के समान चुप रहा। वह उस मेमने के समान चुप रहा जिसका ऊन उतारा जा रहा हो। अपना बचाव करने के लिए उसने कभी अपना मुँह नहीं खोला।

लोगों ने उसपर अपना बल प्रयोग किया और उसे ले गए। उसके साथ खेरपन से न्याय नहीं किया गया। उसके भावी परिवार के प्रति कोई कुछ नहीं कह सकता क्योंकि सजीव लोगों की धरती से उसे उठा लिया गया। मेरे लोगों के पापों का भुगतान करने के लिए उसे दण्ड दिया गया था।

उसकी मृत्यु हो गई और दुष्ट लोगों के साथ उसे गाड़ा गया। धनवान लोगों के बीच उसे दफ़नाया गया। उसने कभी कोई हिंसा नहीं की। उसने कभी झूठ नहीं बोला किन्तु फिर भी उसके साथ ऐसी बातें घटीं।

यीशु ने अनेक अवसरों पर अपनी मौत की गवाही दी। यह रहे कुछ उदाहरण:

      मत्ती 16: 21

       उस समय यीशु अपने शिष्यों को बताने लगा कि उसे यरुशलेम जाना चाहिए। जहाँ उसे यहूदी धर्मशास्त्रियों, बुज़ुर्ग यहूदी नेताओं और प्रमुख याजकों द्वारा यातनाएं पहुँचाकर मरवा दिया जाएगा। फिर तीसरे दिन वह मरे हुओं में से जी उठेगा।

 

मत्ती 20:17-19

जब यीशु अपने बारह शिष्यों के साथ यरुशलेम जा रहा था जो वह उन्हें एक तरफ़ ले गया और चलते-चलते उनसे बोला,

सुनो हम यरुशलेम पहुँचने को हैं। मनुष्य का पुत्र वहाँ प्रमुख याजकों और यहुदी धर्मशास्त्रियों के हाथों सौंप दिया जाएगा। वे उसे मृत्यु दण्ड के योग्य ठहराएंगे।

फिर उसका उपहास करवाने और कोड़े लगवाने को उसे ग़ैर यहूदियों को सौंप देंगे। फिर उसे क्रूस पर चढा दिया जाएगा। किन्तु तीसरे दिन वह फिर जी उठेगा!”

 

मत्ती 26:1-2

इन सब बातों के कह चुकने के बाद यीशु अपने शिष्यों से बोला,

तुम लोग जानते हो कि दो दिन बाद फसह पर्व है। और मनुष्य का पुत्र शत्रुओं के हाथों क्रूस पर चढ़ाए जाने के लिए पकड़वाया जाने वाला है।

 

मत्ती 26:6-12

यीशु जब बैतनिय्याह में शमौन कोढ़ी के घर पर था तभी एक स्त्री सफ़ेद चिकने, स्फटिक के पात्र में बहुत कीमती इत्र भर कर लाई और उसे उसके सिर पर उँडेल दिया। उस समय वह पटरे पर झुका बैठा हुआ था।

जब उसके शिष्यों ने यह देखा तो वे क्रोध में भर कर बोले, इत्र की ऐसी बर्बादी क्यों की गई? यह इत्र अच्छे दामों में बेचा जा सकता था और फिर उस धन को दीन दुखियों में बाँटा जा सकता था।

यीशु जान गया कि वह क्या कह रहे हैं। सो उनसे बोला, तुम इस स्त्री को क्यों तंग कर रहे हो? उसने तो मेरे लिए एक सुन्दर काम किया है?

क्योंकि दीन दुःखी तो सदा तुम्हारे पास रहेंगे पर मैं तुम्हारे साथ सदा नहीं रहूँगा। उसने मेरे शरीर पर यह सुगंधित इत्र छिड़क कर मेरे गाड़े जाने की तैयारी की है।

 

 

क्रूस पर यीशु की हुई मृत्यु के कुछ चश्मदीद गवाह यह हैं:

मरियम मगदलीनी

याकूब और यूसुफ़ की माता मरियम

यीशु की माता मरियम

वह शिष्य जिन्हें यीशु ने प्यार किया (यूहन्ना 19:26)

 

 

यह उन लोगों के नामों की सूची है, जिन्होंने यीशु के मृत शरीर के शवाधान में भाग लिया:

अरिमेथिया के यूसुफ़

निकोडेमस

मरियम मगदलीनी

याकूब और यूसुफ़ की माता मरियम

 

यहां तक कि ग़ैर-ईसाई सूत्रों ने लिखा है कि यीशु मरे:

 

  जोसेफ़स (37 ई. में पैदा होने वाले और 100 ई. में मरने वाले यहूदी इतिहासकार) ने यीशु की मृत्यु के बारे में कहा (ऐन्टिकिट्ज़ 18.3.3)

 

  टैकिटस (55-120 ई.), प्राचीन रोम के एक प्रसिद्ध इतिहासकार ने 115 ई. में लिखा कि मसीह पीलातूस के द्वारा मारा गया (एन्नल्ज़ 15.44)

 

कानून/टोरा की आवश्यकता है कि एक मामले को दो या तीन गवाहों द्वारा स्थापित किया जाए (व्यवस्था विवरण 17:6-7)। इसलिए, यीशु, ओल्ड टैस्टमैंट ईश्वरदूतों, यीशु के अनुयायियों, ग़ैर-ईसाई इतिहासकारों, वग़ैरह की गवाहियाँ आदि मुहम्मद (या क़ुरान) की गवाही (जो घटना के लगभग छ: सौ साल बाद लिखी गई) की तुलना में सही हैं, कानूनी हैं और विश्वसनीय हैं। सीधे शब्दों में कहें, मूसा का कानून क़ुरान पर विश्वास करना ग़ैर-कानूनी ठहराता है।

 

यहाँ एक और कारण है कि क्यों क़ुरान पर विश्वास करना ग़ैर-कानूनी है। मुहम्मद का दावा है कि फरिश्ते गेब्रियल की उनसे बात एक ऐतिहासिक दावा है। क्या ऐतिहासिक सबूत है कि फरिश्ते गेब्रियल ने मुहम्मद से बात की? क्या कोई चश्मदीद गवाही है, या केवल मुहम्मद ही अपने इस दावे के गवाह हैं कि गेब्रियल ने उनसे बात की है? बाइबिल कहता है कि  जैसे दावे मुहम्मद ने किए उसे स्थापित करने के लिए दो या तीन गवाहों की गवाही की आवश्यकता है। मूसा और यीशु के विपरीत, केवल मुहम्मद ही फरिश्ते गेब्रियल के विषय में गवाह थे। इसका अर्थ यह है कि मुहम्मद का दावा ईश्वर के कानूनों का उल्लंघन है और विशेष रूप से,  इसलिए अधर्मी है क्योंकि वह मूसा और यीशु की पहले से पुष्टि की गई और वैध गवाही का विरोध करता है।

 

मैंने पढ़ा है कि क़ुरान में जब एक औरत पर व्यभिचार के आरोप लगते हैं तो चार गवाहों की आवश्यकता पड़ती है (अल-मइदा 4:15; अल-नूर 24:4; cf 2:282) बेशक, व्यभिचार एक गंभीर आरोप है और गवाहों की आवश्यकता होनी चाहिए। परन्तु फिर भी, मुहम्मद का दावा कि ईसाई ग्रंथ मिलावटी हैं एक और भी ज़्यादा गंभीर दावा है। मुहम्मद ने ईसाई ग्रंथों में मिलावट का आरोप लगाने के समर्थन में क्या साक्षी/गवाह दिए थे?

   

मुहम्मद के पास कोई गवाह नहीं है कि फरिश्ते गेब्रियल ने उनसे बात की थी। मुहम्मद के पास कोई गवाह नहीं है कि जो शब्द उन्होंने कहे वह ईसाई ग्रंथों से अधिक प्रामाणिक हैं। मुहम्मद क्रूस पर यीशु की मृत्यु के ऐतिहासिक तथ्य से बेहतर गवाही नहीं पेश कर पाए और ना ही आप कर सकते हैं।

 

हालांकि यह निश्चित रूप से दावा करते हैं कि अन-निसा 4:157 एक ऐतिहासिक दावा है, वह ऐतिहासिक निश्चितता से बहुत दूर है,

 

      "और उनके उस कथन के कारण कि हमने मरयम के बेटे ईसा मसीह अल्लाह के रसूल को क़त्ल कर डाला - हालांकि न तो इन्होंने उसे क़त्ल किया और न उसे सूली पर चढ़ाया, बल्कि मामला उनके लिए संदिग्ध हो गया। और जो लोग इसमें विभेद कर रहे हैं, निश्चय ही वे इस मामले में संदेह में थे। अटकल पर चलने के अतिरिक्त उनके पास कोई ज्ञान न था।"

 

ऐतिहासिक दृष्टिकोण से यह दावा ग़लत है। यह दावा घटना के सैकड़ों साल बाद किया गया और इसका पहली सदी से कोई ऐतिहासिक समर्थन नहीं है, यीशु के किसी भी अनुयायी ने न इसे लिखा है या गवाही दी है कि यीशु क्रूस पर केवल मरते हुए दिखाया गया। क़ुरान इस बात की व्याख्या नहीं करता कि क्रूस पर कौन मरा, इस बात की व्याख्या नहीं करता कि यीशु के चेलों को क्या धोखा हुआ और यह नहीं समझाता कि क्यों अल्लाह ने इस बारे में सैकड़ों वर्षों तक दुनिया को धोखा देने की अनुमति दी है (या अल्लाह ने दुनिया को धोखा दिया?) वह मुसलमान हैं जो अनुमान लगा रहे हैं; वह मुसलमान हैं जिन्हें कोई खास ज्ञान नहीं है; वह मुसलमान हैं जो संदेह से भरे हैं कि क्रूस पर चढ़ाते समय क्या हुआ। सभी ईसाई (रोमन कैथोलिक, रूढ़िवादी, और कट्टर) सहमत हैं इस बात से कि यीशु ही मरे...

 

अध्याय का बाकी हिस्सा पढ़ने के लिए खरीदें

क़ुरान ईश्वर का शब्द क्यों नहीं है

 

 

 

 

शास्त्र का प्रचारण और क़ुरान

न तो मुसलमान और न ही ईसाईयों के पास "असली पांडुलिपियाँ" हैं। "असली पांडुलिपियों" के होने से कोई चीज़ "ईश्वर का शब्द" नहीं हो जाता। इसी तरह, मानव निर्मित प्रतियां होने का अर्थ यह नहीं है कि यह "ईश्वर का शब्द" नहीं हो सकता। मुसलमानों को विश्वास नहीं है कि ईश्वर ने  मुहम्मद को क़ुरान की एक प्रति सौंपी है। ईसाईयों को विश्वास नहीं है कि यीशु ने नए टेस्टामेंट को लिखा था और अपने समर्थकों को सौंपा था।

 

ईश्वर के शब्द विभिन्न साधनों के माध्यम से फैलाए जाते हैं। कोई भी चीज़ "ईश्वर का शब्द" हो सकता है, भले ही वह फरिश्तों के मुंह से,  ईश्वरदूतों के मुंह से, ईश्वरदूतों की कलम से, लेखकों की प्रतियों आदि से आए। ईश्वर के शब्द बस उसकी सीधे तौर पर आवाज़ सुनने या उसके द्वारा लिखी गई चीज़ के पास होने से कहीं ज़्यादा है। 

   

नया टेस्टामेंट मूल रूप से लिखी गई प्रतियों में निहित है। ये सभी प्रतियां एक दूसरे के साथ सहमत नहीं हैं। ईसाईयों के पास हज़ारों टुकड़ों और हस्तलिखित प्रतियों के रूप में असली प्रतियों का 100% हिस्सा है, लेकिन नए टेस्टामेंट का तकरीबन 2% हिस्सा है, जहाँ हमें चुनना पड़ता है कि असली लिखाई कौन-सी थी और कौन-सी नहीं थी। ये मामूली मतभेद हैं और यह समझना आवश्यक है कि यहाँ कोई बड़े ईसाई सिद्धांत दांव पर नहीं हैं। पाठ के इस 2%  हिस्से पर  निर्णय लेने को शाब्दिक आलोचना का विज्ञान कहा जाता है।

 

अगर कोई क़ुरान के शब्दों को बदलने की कोशिश करे तो आपको कैसे पता चलेगा? आप क़ुरान के उनके संस्करण की तुलना अन्य हस्तलिखित प्रतियों के साथ करेगें। निम्नलिखित उदाहरण लें। यह थोड़ा अत्यंत होगा मगर यह समझने में उपयोगी होगा कि क्यों असली प्रति के न होते हुए भी और प्रतियों में अंतर होने के बावजूद भी यह निर्धारित किया जा सकता है कि असली प्रति क्या कहती है।

 

            मान लिजिए कि आपकी चाची सैली ने एक सपना देखा जिसमें वह एक ऐसे अमृत का       नुस्खा सीख लेती हैं जो उनके यौवन को लगातार बनाए रखेगा। जब वह जागी, तो       कागज़ के एक टुकड़े पर वह निर्देश लिख लेती है और रसोई में अपना पहला गिलास       बनाने पहुँच जाती है। कुछ ही दिनों में उसका रूप बदल जाता है। "चाची सैली के गुप्त       सॉस" की दैनिक खुराक की वजह से सैली, उज्ज्वल यौवन का एक चित्र है।

 

सैली इतनी उत्साहित है कि उसने अपने हाथ से लिखे सॉस बनाने के विस्तृत निर्देशों को अपने तीन ब्रिज साथियों को भेज दिया (चाची सैली उस सदी की हैं जब कोई फोटोकॉपी या ईमेल नहीं था)। उन तीनों ने भी प्रतियां बनाकर अपने दस-दस दोस्तों को भेज दिया।

 

सब कुछ ठीक था कि एक दिन चाची सैली का पालतू कुत्ता नुस्खे की असली प्रति को खा गया। सैली बहुत परेशान हो गई। घबराहट में उसने अपने तीनों दोस्तों से संपर्क किया जिनके साथ रहस्यमय तरीके से वैसी ही दुर्घटनाएं हुई थीं। उनकी प्रतियां भी गई, इसलिए असली शब्दों को ढ़ूढ़ने की कोशिश में उनके दोस्तों से संपर्क किया गया।

 

अंततः सभी बची हुई हाथ से लिखी गई प्रतियां, संख्या में छब्बीस, को इकट्ठा किया गया। जब उन्हें रसोई घर की मेज़ पर फैलाया गया, तो तुरंत कुछ मतभेद देखे गए। तेईस प्रतियां बिल्कुल एक जैसी हैं। शेष तीन में से एक मे कुछ ग़लत लिखे गए शब्द हैं और एक में उल्टे किए गए वाक्यांश ("काटें फिर मिश्रित करें" की जगह है "मिश्रित करें फिर काटें") और एक में एक ऐसी सामग्री है जो दूसरों की सूची में शामिल नहीं है।

 

महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या आपको लगता है कि चाची सैली असली नुस्खे को सही तरह से संगठित कर सकती है? बेशक वह कर सकती है। ग़लत लिखे गए शब्दों को आसानी से सही कर सकते हैं, एक उल्टा वाक्यांश सीधा किया जा सकता है और अतिरिक्त सामग्री को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है।

 

कई या विभिन्न रूपांतरों के साथ भी असली को सही मूलपाठ के प्रमाण के साथ अत्यधिक विश्वास के साथ पुनर्निर्मित किया जा सकता है। ग़लत लिखे गए शब्द स्पष्ट रूप से त्रुटियाँ हैं, उल्टे किए गए वाक्यांश साफ दिखेंगे और आसानी से सुधारे जा सकते हैं, और यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि एक प्रति में एक शब्द या वाक्य को छोड़ देना, उन्हें ग़लती से जोड़ देने से अधिक स्वीकार्य है।

 

सीधे तौर से, शाब्दिक आलोचना का विज्ञान ऐसे काम करता है (ग्रेगरी कूक्ल, "नए टेस्टामेंट के संशयवादियों के लिए तथ्य" - "फैक्ट्स फॉर स्केपटिक्स ऑफ द न्यू टेस्टामेंट).

 

हज़ार  रुपए के एक जाली नोट के संपूर्ण मुद्रण की तुलना में बेहतर है कि एक असली नोट का मुद्रण थोड़ा अपूर्ण हो। बुनियादी सवाल यह नहीं है कि ईसाईयों की प्रतियां थोड़ी अपूर्ण हैं या मुसलमानों की, बल्कि यह कि कौन-सा धर्म सही है और कौन-सा जाली है।

 

एक नोट का थोड़ा अपूर्ण होना इस बात का प्रमाण नहीं है कि नोट जाली है। थोड़ा अपूर्ण नोट, जो जाली नहीं है, तब भी वैध मुद्रा के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। नए टेस्टामेंट के टुकड़ों और पांडुलिपियों के बीच अंतर इस बात का प्रमाण नहीं है कि यीशु की क्रूस पर मृत्यु जाली है और इसलिए उसे खारिज कर देना चाहिए।

 

लोगों ने नए टेस्टामेंट को परिवर्तित करने और भ्रष्ट करने का प्रयत्न किया है। लेकिन ईश्वर ने नए टेस्टामेंट को संरक्षित करने का एक तरीके यह इस्तेमाल किया है कि पांडुलिपियों की कई प्रतियां उपलब्ध कराई हैं। यह एकाधिक प्रतियाँ एकीकृत होकर यह पुष्टि करती हैं कि यीशु की मृत्यु क्रूस पर हुई; हम जानते हैं कि यह शिक्षण निश्चित रूप से असली है। मुसलमानों को यह प्रदर्शित करने की आवश्यकता नहीं है कि लोगों ने बाइबिल को बदलने की कोशिश की है। इस्लाम एक जीवित सबूत है कि लोगों ने बाइबिल को बदलने की कोशिश की है। बल्कि, मुसलमानों को पांडुलिपि सबूत से और/या इतिहास से यह प्रमाणित करने की आवश्यकता है कि इतिहास में पहले किसने नए टेस्टामेंट को बदलने की कोशिश की और बदल पाने में सफल रहा जिससे कि अब वह यह सिखाता है कि यीशु की मृत्यु क्रूस पर हुई । वे इस तरह के सबूत को पेश करने में असफल रहे हैं जिससे यह साबित होता है कि क़ुरान इसका जाली दावा है कि वह ईश्वर का शब्द है।

 

 

 

The Gospel of Barnabas बरनबास के सुसमाचार

 

यशायाह 8:20

तुम्हें शिक्षाओं और वाचा के अनुसार चलना चाहिए। यदि तुम इन आज्ञाओं का पालन नहीं करोगे तो हो सकता है तुम ग़लत आज्ञाओं का पालन करने लगो।

 

 

मुसलमानों के ईमेल और मिर्ज़ा ग़ुलाम के अनुयायियों के भी

 

 

Ø बरनबास के सुसमाचार में हमें बताया जाता है कि यीशु (अल्लाह उनको मक़फ़रत दे) को पता था कि उनके जाने के बाद मानव जाति उन्हें ईश्वर बना देगी और उन्होंने अपने अनुयायियों से सख्ती से ऐसे लोगों से मेलजोल करने से उनको चेताया था।

 

 

Ø मैं पहले से ही बाइबिल पढ़ चुका हूँ और वह भी पढ़ा है जिसे पढ़ने की मनाही है! यानि, बरनबास। इसे पढ़ें और अंतर देखें। ईश्वर तुम्हें सच की ओर मार्गदर्शित करे। 

 

Ø अब तक, बरनबास के सुसमाचार ही केवल यीशु के जीवन और मिशन का चश्मदीद गवाह है।

 

 

मेरा ईसाई उत्तर

 

 

मिर्ज़ा ग़ुलाम मुहम्मद ने लिखा,

 

यह सब कहने के बाद, यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि बरनबास के सुसमाचार में, जो ब्रिटिश म्यूज़ियम में उपलब्ध होगी, यह कहा गया है कि यीशु को क्रूस पर नहीं चढ़ाया गया और न ही क्रूस पर उनकी मृत्यु हुई। अब हम यह भली-भांति कह सकते हैं कि हालांकि यह पुस्तक सुसमाचारों में शामिल नहीं है और इसे सरसरी तौर पर अस्वीकार कर दिया गया है, इस बात से नहीं इनकार किया जा सकता है कि यह एक प्राचीन पुस्तक है, जिसे उस समय लिखा गया था जब बाकी सुसमाचार लिखे गए थे। क्या यह हम पर नहीं है कि हम इस प्राचीन पुस्तक को प्राचीन काल के इतिहास की एक पुस्तक के रूप में माने और उसका उपयोग इतिहास की एक पुस्तक के रूप में करें? (http://www.alislam.org/library/books/jesus-in-india/ch1.html)

 

यह दावा कि बरनबास के सुसमाचार एक प्राचीन पुस्तक है और उस समय की है जब बाकी सुसमाचार लिखे गए थे, बिल्कुल ग़लत है। तथ्य यह है कि ऊपर दी गई टिप्पणियाँ इसपर संदेह डालती है कि क्या मिर्ज़ा गुलाम अहमद को पता था कि वह क्या कह रहे थे। बरनबास के सुसमाचार को 1 ई. सदी में रहने वाले बरनबास ने नहीं लिखा था। ऐसा प्रतीत होता है कि बरनबास के सुसमाचार को 16 ई. सदी में लिखा गया था। अधिकतर शिक्षाविदों (जिसमें ईसाई और मुसलमान दोनों ही शामिल हैं) का यह विचार है कि बरनबास का सुसमाचार देर में आया था और स्यूडोएपिग्राफिकल है। http://en.wikipedia.org/wiki/Gospel_of_barnabas

 

मुझे पता है कि जानकारी के लिए विकिपीडिया हमेशा सबसे अच्छा स्रोत नहीं है इसलिए यह रहा एक सराहनीय शैक्षणिक विश्वकोश से एक उद्धरण,

 

      एक पाठ, बरनबास के सुसमाचार, का आधुनिक समय में व्यापक प्रचलन रहा है। इसे एम्स्टर्डैम में एक इतालवी पांडुलिपि में 1709 में पाया गया था। बीसवीं सदी में अरबी में किए गए अनुवाद के बाद, कुछ लोगों ने यह दावा किया है कि यह असली सुसमाचार को सुरक्षित करता है जिसके बारे में क़ुरान में बताया गया है। परन्तु, बरनबास के सुसमाचार का उद्गम, 16 वीं सदी में, पश्चिमी मेडिटरेनियन दुनिया में, शायद स्पेन में, हुआ था।

 

उल्लेख:  "गॉस्पेल।" क़ुरान की एन्साईक्लोपीडिया। जनरल संपादक: जेन डेमन मैकऔलिफ। ब्रिल (लेडन और बॉस्टन, 2005। सीडी-रॉम संसकरण

 

सादर प्रणाम,

ऐरन

 

खरीदकर पुस्तक का शेष भाग पढ़ें:

क़ुरान ईश्वर का शब्द क्यों नहीं है

दाम: $2.95

 

http://www.payloadz.com/img/btn-buynow-orange-1.gif 

 

 

 

 

 



[1] इससे संबंधित सच है कि ईश्वर अपनी सृष्टि में स्वयं को दिखाता है। सृष्टि में ईश्वर के काम को अस्वीकार करना है ईश्वर को अस्वीकार करना है, "जब से संसार की रचना हुई उसकी अदृश्य विशेषताएंअनन्त शक्ति और परमेश्वरत्वसाफ-साफ दिखाई देते हैं क्योंकि उन वस्तुओं से वे पूरी तरह जानी जा सकती हैं, तो परमेश्वर ने रचीं। इसलिए लोगों के पास कोई बहाना नहीं।" (रोमियों 1:20).